जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 04 सितम्बर ::
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें असहमति के लिए जगह होती है। सत्ता और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी ताकत हैं। सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना, नीतियों की आलोचना करना और सत्ता से जवाब मांगना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। उसी तरह सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा माने और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को सर्वोच्च रखे। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक मतभेद की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? निश्चित रूप से होनी चाहिए। लोकतंत्र में विचारों का टकराव हो सकता है, राजनीतिक संघर्ष हो सकता है, चुनावी प्रतिस्पर्धा हो सकती है, लेकिन राष्ट्रहित से बड़ा कोई दल और राष्ट्र से बड़ा कोई नेता नहीं हो सकता है। सत्ता आज किसी एक दल के पास है, कल दूसरे के पास हो सकती है। नेता आते-जाते रहते हैं, लेकिन राष्ट्र और उसकी संस्थाएं स्थायी होती है। इसलिए पक्ष हो या विपक्ष, अंतिम कसौटी यही होनी चाहिए कि उसके कदमों से देश और जनता का हित कितना मजबूत होता है।
सरकार के किसी आर्थिक आंकड़े पर सवाल उठाना गलत नहीं है। आंकड़ों की विश्वसनीयता की जांच करना तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में जरूरी है। आर्थिक नीतियों की आलोचना भी होनी चाहिए और सरकार से यह पूछा भी जाना चाहिए कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा। लेकिन आलोचना और अविश्वास के बीच एक महीन रेखा होती है। यदि कोई आंकड़ा सरकार के पक्ष में जाता है तो उसकी स्वतंत्र जांच की मांग करना समझ में आता है। लेकिन यदि बिना पर्याप्त प्रमाण के पहले ही यह घोषित कर दिया जाए कि आंकड़े गलत हैं, आंकड़े बनाए गए हैं या पूरी व्यवस्था ही हेरफेर पर आधारित है, तो सवाल उठता है कि क्या यह आलोचना है या राजनीतिक पूर्वाग्रह? लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार को कठघरे में खड़ा करना है, लेकिन देश को कठघरे में खड़ा करना नहीं।
जैवमंडल के किसी भी भूखंड पर कदम रखिए, एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति से सामना होगा वह है ईर्ष्या। जहां कोई आगे बढ़ता है, वहां कुछ लोग उसकी सफलता में अपनी असफलता का प्रतिबिंब देखने लगते हैं। यह प्रवृत्ति व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। कभी परिवार में दिखाई देती है, कभी समाज में और कभी राष्ट्रों के बीच भी। भारत भी इससे अछूता नहीं हो सकता है। एक समय था जब भारत को दुनिया की सबसे बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था और वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका सीमित मानी जाती थी। आज परिस्थितियां बदली हैं। भारत की अर्थव्यवस्था, डिजिटल ढांचा, बुनियादी संरचना, अंतरिक्ष कार्यक्रम, विनिर्माण क्षमता और वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव लगातार चर्चा में हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि दुनिया भारत के हर बड़े कदम को ध्यान से देखे। लेकिन इसी के साथ एक सवाल और खड़ा होता है कि जब दुनिया भारत की प्रगति को जांचने में लगी है, तब क्या भारत के भीतर बैठे लोगों का काम भी केवल उसमें दोष ढूंढ़ना रह जाना चाहिए?
भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़े हालिया जीडीपी आंकड़े इसी बहस का उदाहरण बन गए हैं। दूसरी छमाही में विकास दर का आंकड़ा 7.8 प्रतिशत बताया गया है। यह आंकड़ा निश्चित रूप से ऐसा है जिसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में गंभीरता से देखा जाएगा। किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए तेज विकास दर केवल एक प्रतिशत संख्या नहीं होती है। उसके पीछे रोजगार, निवेश, उत्पादन, उपभोग, बुनियादी ढांचे और भविष्य की आर्थिक क्षमता जैसे अनेक पहलू जुड़े होते हैं। इसलिए जब भारत 7.8 प्रतिशत जैसी विकास दर दर्ज करता है, तो इसका विश्लेषण होना स्वाभाविक है। दुनिया के अर्थशास्त्री पूछेंगे कि यह वृद्धि किन क्षेत्रों से आई? निजी निवेश की स्थिति क्या है? खपत कितनी मजबूत है? विनिर्माण और सेवा क्षेत्र का योगदान कितना है? रोजगार का क्या असर पड़ा? वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत ने यह गति कैसे कायम रखी? ये सभी सवाल जायज हैं। लेकिन दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति बिना ठोस प्रमाण के यह मान ले कि वास्तविक वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत नहीं बल्कि केवल 2.6 प्रतिशत होनी चाहिए, तो उसे अपने दावे का आधार भी बताना होगा। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन सवाल के साथ प्रमाण की जिम्मेदारी भी होती है।
आज भारत दुनिया की निगाहों से छिपा हुआ देश नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी हो चुकी है कि उसके आर्थिक आंकड़ों का असर वैश्विक बाजारों और निवेशकों के फैसलों तक पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, रेटिंग एजेंसियां, निवेशक, आर्थिक विशेषज्ञ और दुनिया भर के शोधकर्ता भारत के आर्थिक प्रदर्शन का विश्लेषण करते हैं। ऐसे माहौल में आंकड़ों में बड़े पैमाने पर हेरफेर करना कोई आसान काम नहीं हो सकता। यदि कोई कहता है कि 7.8 प्रतिशत की विकास दर वास्तव में 2.6 प्रतिशत है, तो यह केवल राजनीतिक भाषण का विषय नहीं रह जाता है। इसके लिए मजबूत आर्थिक मॉडल, आंकड़ों की वैकल्पिक गणना और प्रमाण प्रस्तुत करने पड़ेंगे। यही वैज्ञानिक और आर्थिक विमर्श का तरीका है। दुनिया सबूत मांगती है, राजनीति अक्सर संदेह पैदा करती है। लेकिन देशहित में हमें तय करना होगा कि हम किस रास्ते पर चलना चाहते हैं।
व्यंग्य के स्तर पर सोचिए कि यदि भारत ने वास्तव में ऐसे आंकड़े तैयार कर दिए जिन्हें पूरी दुनिया के अर्थशास्त्री, वित्तीय संस्थान, निवेशक और विशेषज्ञ स्वीकार कर रहे हैं, तो फिर इसे साधारण चतुराई नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि पूरी दुनिया की निगाह किसी एक देश पर हो और फिर भी कोई देश कथित रूप से ऐसा आंकड़ा तैयार कर दे जिसे कोई पकड़ न सके, तो उसके लिए असाधारण क्षमता की जरूरत होगी। लेकिन यहां व्यंग्य का उद्देश्य किसी आंकड़े की सत्यता घोषित करना नहीं है। असली सवाल यह है कि बिना पर्याप्त प्रमाण के अविश्वास को सत्य का स्थान क्यों दे दिया जाए? यदि आंकड़ा गलत है तो प्रमाण सामने रखिए। यदि गणना में खामी है तो वैकल्पिक गणना प्रस्तुत कीजिए। यदि पद्धति गलत है तो विशेषज्ञों के साथ बहस कीजिए। लेकिन केवल इसलिए कि आंकड़ा सरकार के पक्ष में दिखाई दे रहा है, उसे खारिज कर देना तर्कसंगत नहीं हो सकता है।
हमारी राजनीतिक संस्कृति की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या हम अपने दल के हित और राष्ट्रहित के बीच अंतर कर पाते हैं? सत्ता पक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश केवल सरकार चलाने वाले दल का नहीं है। विपक्ष को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि देश केवल उस सरकार का विरोध करने का मंच नहीं है। सरकार गलत हो सकती है। विपक्ष गलत हो सकता है। नीतियां गलत हो सकती हैं। आर्थिक अनुमान गलत हो सकते हैं। लेकिन राष्ट्र गलत नहीं हो सकता है। इसलिए राजनीतिक संघर्ष का केंद्र सत्ता की आलोचना हो, राष्ट्र की प्रतिष्ठा को कमजोर करना नहीं।
एक मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है। लेकिन मजबूत विपक्ष वह नहीं जो हर सरकारी उपलब्धि को अस्वीकार कर दे। मजबूत विपक्ष वह है जो सरकार की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उसकी कमियों को रेखांकित करे और बेहतर विकल्प जनता के सामने रखे। यदि सरकार कहती है कि अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, तो विपक्ष कह सकता है कि विकास की गुणवत्ता क्या है। वह पूछ सकता है कि प्रति व्यक्ति आय कितनी बढ़ी? रोजगार कितने पैदा हुए? ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा? महंगाई की स्थिति क्या है? छोटे उद्योगों को कितना लाभ मिला? यही सार्थक बहस होगी। लेकिन यदि बहस इस बिंदु पर पहुंच जाए कि “सरकार कह रही है इसलिए गलत है”, तो लोकतांत्रिक विमर्श अपनी गंभीरता खो देता है।
यह बात केवल विपक्ष पर लागू नहीं होती है। सत्ता पक्ष को भी समझना होगा कि आर्थिक विकास का आंकड़ा अपने आप में अंतिम प्रमाण नहीं है। 7.8 प्रतिशत विकास दर निश्चित रूप से उत्साह का विषय हो सकती है, लेकिन सरकार की असली सफलता तब मानी जाएगी जब उसका असर आम आदमी की जिन्दगी में दिखाई दे। रोजगार बढ़े, आय बढ़े, महंगाई नियंत्रित रहे, किसानों की स्थिति सुधरे, उद्योगों को अवसर मिले, युवाओं के लिए नए रास्ते खुले और विकास का लाभ देश के हर हिस्से तक पहुंचे, तभी आर्थिक आंकड़े वास्तविक अर्थों में सार्थक होंगे। इसलिए सरकार को भी आलोचना से घबराने की जरूरत नहीं है। अच्छी सरकार आलोचना से कमजोर नहीं होती है, बल्कि सही आलोचना से मजबूत होती है।
भारत आज जिस मुकाम पर खड़ा है, वहां सबसे महत्वपूर्ण चीज केवल जीडीपी की दर नहीं है। उससे भी महत्वपूर्ण है वैश्विक विश्वास। निवेशक भारत पर भरोसा करे। युवा भारत के भविष्य पर भरोसा करे। उद्योग भारत की नीतियों पर भरोसा करे। दुनिया भारत की संस्थाओं पर भरोसा करे और सबसे महत्वपूर्ण है कि भारत के नागरिक अपने देश की क्षमता पर भरोसा करे। इस विश्वास को मजबूत करने के लिए पारदर्शिता आवश्यक है। सरकार को आंकड़ों को लेकर सवालों का जवाब देना चाहिए। स्वतंत्र संस्थाओं और विशेषज्ञों को विश्लेषण का अवसर मिलना चाहिए। विपक्ष को प्रमाण आधारित आलोचना करनी चाहिए और मीडिया को राजनीतिक दावों के बजाय तथ्यों की पड़ताल करनी चाहिए। यही लोकतंत्र का स्वस्थ रास्ता है।
भारत में राजनीतिक मतभेद हमेशा रहे हैं और आगे भी रहेंगे। अलग-अलग विचार होना स्वाभाविक है। सत्ता और विपक्ष का संघर्ष लोकतंत्र को जीवंत रखता है। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि चुनाव पांच साल का होता है, राष्ट्र हजारों वर्षों का। सरकार बदलती है। मुख्यमंत्री बदलते हैं। प्रधानमंत्री बदलते हैं। दल सत्ता में आते-जाते हैं। लेकिन भारत बना रहता है। इसलिए राजनीतिक असहमति को राष्ट्रहित की मर्यादा में रखना केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। भारत की उपलब्धियों पर गर्व करना अंधभक्ति नहीं है और भारत की कमियों पर सवाल उठाना राष्ट्रविरोध नहीं है। दोनों के बीच संतुलन ही स्वस्थ राष्ट्रवाद और स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
भारत की आर्थिक यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। 7.8 प्रतिशत हो या कोई दूसरी विकास दर, एक आंकड़ा भारत की पूरी कहानी नहीं लिख सकता है। भारत की कहानी करोड़ों लोगों की मेहनत से लिखी जाएगी। किसान के खेत से। मजदूर के पसीने से। उद्यमी के जोखिम से। युवा के सपनों से। वैज्ञानिक की प्रयोगशाला से। सैनिक की सीमा पर तैनाती से और उस नागरिक के विश्वास से, जो तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद अपने देश को आगे बढ़ते देखना चाहता है। इसलिए जरूरी है कि हम आंकड़ों पर बहस करें, लेकिन आंकड़ों को राजनीतिक हथियार न बनाएं। सरकार की आलोचना करे, लेकिन देश की उपलब्धियों को नकारने की मजबूरी न पालें। विपक्ष से सवाल पूछें, सत्ता से जवाब मांगें, लेकिन दोनों को एक ही कसौटी पर रखें- भारत और भारतीय जनता का हित। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे बड़ा विजेता कोई राजनीतिक दल नहीं होता है। सबसे बड़ा विजेता राष्ट्र होता है और जब भारत आगे बढ़ता है, तो उसकी सफलता किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे देश की सफलता होती है। इसलिए दुनिया अगर भारत की प्रगति में बाल बराबर खामी खोज रही है, तो हमें भी भावनाओं के बजाय तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए और यदि कोई खामी वास्तव में है, तो उसे स्वीकार कर सुधारना चाहिए। लेकिन केवल इसलिए कि भारत आगे बढ़ रहा है, उसके हर कदम में साजिश तलाशना भी उतना ही अनुचित है जितना हर सरकारी दावे को अंतिम सत्य मान लेना। भारत को न अंधभक्ति चाहिए, न अंधविरोध बल्कि भारत को चाहिए तथ्य, तर्क, पारदर्शिता और राष्ट्रहित। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।
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