*कितना अहम है सिलिगुड़ी कॉरिडोर?*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 12 अक्टूबर ::

भारत के नक्शे पर कुछ ऐसे भू-भाग हैं, जिनका महत्व उनके आकार से कहीं अधिक होता है। पश्चिम बंगाल के उत्तर में स्थित सिलिगुड़ी कॉरिडोर ऐसा ही एक संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र है। आम बोलचाल में इसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है। यह संकरा भू-मार्ग भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम से जोड़ता है। इसलिए इसे केवल एक सड़क या रेल मार्ग नहीं, बल्कि देश की भौगोलिक एकता, आर्थिक गतिविधियों, सैन्य गतिशीलता और पूर्वोत्तर की जीवनरेखा के रूप में देखा जाता है। भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय जमीनी सीमा है। इसके अलावा सिलिगुड़ी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसके आसपास नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमाएं भी अपेक्षाकृत निकट है। यही कारण है कि इस छोटे से भू-भाग का महत्व राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से असाधारण हो जाता है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर की चौड़ाई अलग-अलग स्थानों पर बदलती है और सामान्यतः इसे लगभग 20 से 25 किलोमीटर के आसपास का संकरा भू-भाग माना जाता है। कई विवरणों में इसकी चौड़ाई 22 से 28 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसके पश्चिम में नेपाल और उत्तर में भूटान का क्षेत्र है, जबकि दक्षिण की ओर बांग्लादेश स्थित है। यही भौगोलिक स्थिति इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। भारत का मुख्य भूभाग और पूर्वोत्तर क्षेत्र इस संकरे गलियारे के माध्यम से जुड़े हैं। यदि किसी कारण से इस संपर्क में गंभीर व्यवधान पैदा हो जाए, तो पूर्वोत्तर राज्यों तक सड़क, रेल, ईंधन, खाद्यान्न, औद्योगिक सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इसलिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर को समझना केवल सीमा सुरक्षा को समझना नहीं है। यह भारत की कनेक्टिविटी, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय एकीकरण को समझने का भी विषय है।

पूर्वोत्तर भारत प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता, जलविद्युत क्षमता और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण महत्वपूर्ण है। लेकिन इसकी एक बड़ी विशेषता यह भी है कि अधिकांश पूर्वोत्तर राज्य देश के शेष हिस्सों से भौगोलिक रूप से अलग स्थिति में हैं। देश के अन्य हिस्सों से पूर्वोत्तर की बड़ी मात्रा में वस्तुओं की आपूर्ति सड़क और रेल नेटवर्क के जरिए होती है। इस नेटवर्क का सबसे महत्वपूर्ण स्थलीय संपर्क सिलिगुड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है। खाद्यान्न, पेट्रोलियम उत्पाद, निर्माण सामग्री, औद्योगिक सामान, दवाइयां और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा पूर्वोत्तर से देश के दूसरे हिस्सों तक चाय, पेट्रोलियम, प्राकृतिक संसाधन, कृषि उत्पाद और अन्य सामान की आवाजाही भी इसी व्यापक परिवहन नेटवर्क से होती है। इसलिए इस कॉरिडोर की सुरक्षा केवल सेना की चिंता नहीं है। इसका सीधा संबंध करोड़ों लोगों की सामान्य जिन्दगी और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था से है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर से गुजरने वाला सड़क और रेल नेटवर्क सामान्य परिस्थितियों में व्यापार और यातायात का माध्यम है, लेकिन संकट की स्थिति में इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। किसी भी सीमावर्ती क्षेत्र में सैन्य बलों की तैनाती और उनकी तेजी से आवाजाही के लिए सड़क और रेल दोनों की जरूरत होती है। भारी उपकरण, ईंधन, वाहन और अन्य सैन्य संसाधनों को बड़ी मात्रा में स्थानांतरित करने में रेल परिवहन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जबकि सड़क नेटवर्क अंतिम छोर तक पहुंच उपलब्ध कराता है। इसीलिए पिछले वर्षों में उत्तर बंगाल और पूर्वोत्तर से जुड़े सड़क, रेल और पुल परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। उद्देश्य केवल यात्रा को आसान बनाना नहीं है, बल्कि एक से अधिक मार्गों के जरिए संपर्क क्षमता बढ़ाना भी है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर की रणनीतिक संवेदनशीलता का एक प्रमुख कारण भारत-चीन सीमा से इसकी निकटता भी है। सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश भारत के ऐसे क्षेत्र हैं, जिनकी सीमाएं चीन से लगती हैं। सिक्किम के उत्तर में स्थित नाथू ला और आसपास का क्षेत्र लंबे समय से भारत की सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण रहा है। इसके आगे भूटान का क्षेत्र आता है। इसी संदर्भ में डोकलाम क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। डोकलाम भारत, भूटान और चीन के निकट स्थित त्रि-जंक्शन क्षेत्र से जुड़ा है। 2017 में यहां भारत और चीन के बीच लंबा सैन्य गतिरोध हुआ था। उस घटनाक्रम ने दुनिया का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया कि हिमालय के इस हिस्से में किसी भी रणनीतिक बदलाव का प्रभाव भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर तक पड़ सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कॉरिडोर पर तत्काल कोई खतरा मौजूद है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है, जिसके कारण भारत को यहां दीर्घकालिक रणनीतिक तैयारी बनाए रखनी पड़ती है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर के दक्षिण में बांग्लादेश की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। भारत-बांग्लादेश संबंधों में पिछले वर्षों में परिवहन और संपर्क के क्षेत्र में कई बदलाव हुए हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच सड़क, रेल और जलमार्ग संपर्क बढ़ने से पूर्वोत्तर के लिए वैकल्पिक कनेक्टिविटी की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। चटगांव और मोंगला बंदरगाहों के उपयोग से पूर्वोत्तर के लिए समुद्री संपर्क के रास्ते भी विकसित हुए हैं। इसका रणनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि किसी एक मार्ग पर निर्भरता जितनी कम होगी, आपूर्ति व्यवस्था उतनी ही अधिक लचीली होगी। यानि भारत की नीति केवल सिलिगुड़ी कॉरिडोर को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं हो सकती। इसके साथ-साथ वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करना भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है।

आधुनिक युद्ध और संकट केवल सीमा पर सैनिकों की लड़ाई तक सीमित नहीं रहते। आपूर्ति श्रृंखला, परिवहन, ऊर्जा, संचार और बुनियादी ढांचे की निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी महत्वपूर्ण मार्ग पर प्राकृतिक आपदा, भूस्खलन, बाढ़, तकनीकी समस्या या सुरक्षा संबंधी कारणों से यातायात बाधित हो जाए तो वैकल्पिक मार्ग तुरंत उपलब्ध होना जरूरी है। इसीलिए पूर्वोत्तर के लिए भारत सड़क, रेल, हवाई और जलमार्ग, सभी माध्यमों को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा का वास्तविक अर्थ यही है कि यहां बहुस्तरीय और बहुविकल्पीय संपर्क व्यवस्था तैयार हो।

पूर्वोत्तर भारत में रेल कनेक्टिविटी का विस्तार पिछले कुछ दशकों से राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा नीति का प्रमुख हिस्सा रहा है। नए रेल मार्गों, विद्युतीकरण, दोहरीकरण और महत्वपूर्ण पुलों के निर्माण से माल एवं यात्री परिवहन की क्षमता बढ़ती है। सिलिगुड़ी क्षेत्र से जुड़े रेल नेटवर्क को मजबूत करने का एक लाभ यह भी है कि सड़क मार्ग पर दबाव कम किया जा सकता है। भारी मात्रा में माल की आवाजाही के लिए रेल अधिक प्रभावी माध्यम बन सकती है। संकट की स्थिति में यही रेल नेटवर्क आवश्यक सामग्री और सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही में उपयोगी हो सकता है। इसलिए रेल परियोजनाओं को केवल आर्थिक परियोजना के रूप में देखना अधूरा होगा। सीमावर्ती और रणनीतिक क्षेत्रों में परिवहन अवसंरचना स्वयं एक रणनीतिक संपत्ति बन जाती है।

सड़क नेटवर्क की भूमिका अलग है। पूर्वोत्तर के पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में अंतिम छोर तक पहुंच बनाने के लिए सड़कें अनिवार्य हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों, पुलों और सीमा से जुड़े संपर्क मार्गों के निर्माण से सैन्य और नागरिक दोनों तरह की आवाजाही आसान होती है। इससे स्थानीय लोगों को अस्पताल, बाजार, शिक्षा और रोजगार के केंद्रों तक पहुंच मिलती है। सड़क नेटवर्क मजबूत होने का एक अन्य लाभ यह है कि किसी एक मार्ग पर दबाव पड़ने की स्थिति में यातायात को दूसरे मार्ग पर मोड़ा जा सकता है। इसलिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर के आसपास सड़क नेटवर्क का विस्तार केवल सैन्य तैयारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास और आपदा प्रबंधन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

किसी रणनीतिक क्षेत्र की सुरक्षा केवल सैनिकों और हथियारों से नहीं होती। मजबूत पुल, चौड़ी सड़कें, सक्षम रेल लाइन, पर्याप्त भंडारण केंद्र, ईंधन डिपो, संचार व्यवस्था और बिजली आपूर्ति भी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा होते हैं। यदि किसी क्षेत्र में सड़कें कमजोर हैं, पुल सीमित क्षमता वाले हैं और रेल नेटवर्क पर्याप्त नहीं है, तो संकट की स्थिति में सेना और नागरिक प्रशासन दोनों की कठिनाइयां बढ़ सकती है। इसके विपरीत मजबूत बुनियादी ढांचा किसी भी आपात स्थिति में प्रतिक्रिया की क्षमता बढ़ाता है। इसलिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर के संदर्भ में इन्फ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे से अलग विषय नहीं है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर की चर्चा अक्सर सैन्य और सामरिक संदर्भ में होती है, लेकिन इसका नागरिक महत्व भी उतना ही बड़ा है। उत्तर बंगाल के शहर, चाय उद्योग, पर्यटन, कृषि व्यापार और स्थानीय बाजार इस पूरे परिवहन तंत्र से जुड़े हैं। दार्जिलिंग और सिक्किम जाने वाले पर्यटकों से लेकर असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुंचाने वाले व्यापारियों तक, बड़ी संख्या में लोग इस क्षेत्र की कनेक्टिविटी पर निर्भर है। इसलिए यहां सड़क और रेल का विकास स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बनाया गया बुनियादी ढांचा जब स्थानीय नागरिकों के लिए भी उपयोगी होता है, तब उसका आर्थिक और सामाजिक लाभ कई गुना बढ़ जाता है।

सिलिगुड़ी और उससे आगे पूर्वोत्तर की ओर जाने वाले क्षेत्रों में मानसून के दौरान भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और नदी के जलस्तर में वृद्धि जैसी प्राकृतिक चुनौतियां सामने आती है। विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन के कारण सड़क और रेल यातायात बाधित हो सकता है। ऐसी स्थिति में महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्ग अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए रणनीतिक कनेक्टिविटी का अर्थ केवल नए मार्ग बनाना नहीं है। पुराने मार्गों की नियमित निगरानी, पुलों की क्षमता बढ़ाना, मौसम संबंधी चेतावनी व्यवस्था, वैकल्पिक मार्ग और त्वरित मरम्मत व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

आज सुरक्षा केवल भौतिक परिवहन तक सीमित नहीं है। डिजिटल संचार भी राष्ट्रीय अवसंरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पूर्वोत्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, ऑप्टिकल फाइबर और सुरक्षित संचार व्यवस्था मजबूत करना भी आवश्यक है। किसी आपदा या आपात स्थिति में संचार व्यवस्था बाधित होने पर राहत और सुरक्षा अभियानों पर असर पड़ सकता है। इसलिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर और पूर्वोत्तर की सुरक्षा में सड़क, रेल, ऊर्जा, संचार, डिजिटल नेटवर्क का संयुक्त ढांचा तैयार करना जरूरी है।

भारत ने पूर्वोत्तर को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने के लिए केवल सिलिगुड़ी मार्ग पर निर्भरता कम करने के विकल्पों पर भी काम किया है। बांग्लादेश के जरिए संपर्क, अंतर्देशीय जलमार्ग, बंदरगाहों तक पहुंच और क्षेत्रीय सड़क नेटवर्क ऐसे विकल्प हैं, जिनसे पूर्वोत्तर के लिए परिवहन के अतिरिक्त रास्ते विकसित हो सकते हैं। यहां भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का महत्व भी सामने आता है। पूर्वोत्तर को केवल देश का सीमावर्ती क्षेत्र मानने के बजाय दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर भारत के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की सोच में कनेक्टिविटी की बड़ी भूमिका है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इसके आसपास और उससे जुड़े क्षेत्रों में बेहतर बुनियादी ढांचा विकसित किया जा सकता है। बेहतर सड़क और रेल संपर्क से पूर्वोत्तर में उद्योग, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स और व्यापार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। असम का चाय उद्योग, सिक्किम का पर्यटन, अरुणाचल का जलविद्युत क्षेत्र, त्रिपुरा का प्राकृतिक गैस और कृषि क्षेत्र तथा अन्य राज्यों के विशिष्ट संसाधन बेहतर संपर्क से राष्ट्रीय बाजार तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकते हैं। इस प्रकार जो गलियारा सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है, वही भविष्य में आर्थिक विकास का गलियारा भी बन सकता है।

सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाली आबादी किसी भी देश की सुरक्षा व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी होती है। यदि सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की सुविधाएं बेहतर हों तो स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। मजबूत स्थानीय अर्थव्यवस्था का अर्थ है कि लोग अपने क्षेत्र से जुड़े रहें और सीमावर्ती इलाकों में सामान्य जीवन अधिक स्थिर रहे। इसलिए रणनीतिक क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों को एक साथ आगे बढ़ाना अधिक प्रभावी दृष्टिकोण माना जाता है।

किसी भी महत्वपूर्ण कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए तीन स्तरों पर काम जरूरी होता है। पहला- प्रत्यक्ष सुरक्षा, जिसमें सैन्य और अर्धसैनिक बलों की निगरानी, खुफिया तंत्र और सीमा सुरक्षा शामिल होता है। दूसरा- अवसंरचनात्मक सुरक्षा, जिसमें सड़क, रेल, पुल, ऊर्जा और संचार नेटवर्क की मजबूती शामिल होता है। तीसरा- वैकल्पिक संपर्क, जिसमें बांग्लादेश, जलमार्ग, हवाई संपर्क और अन्य सड़क-रेल मार्गों का विकास शामिल होता है। इन तीनों को साथ लेकर चलने से किसी एक मार्ग पर संभावित व्यवधान का असर कम किया जा सकता है।

उत्तर बंगाल और पूर्वोत्तर का क्षेत्र पर्यावरणीय रूप से अत्यंत संवेदनशील है। हिमालयी पारिस्थितिकी, जंगल, नदियां और जैव विविधता इस पूरे क्षेत्र की विशेष पहचान हैं। इसलिए बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा का ध्यान रखना भी आवश्यक है। सड़क और रेल निर्माण में भू-स्खलन जोखिम, जल निकासी, वन क्षेत्र और स्थानीय पारिस्थितिकी को ध्यान में रखना होगा। सुरक्षित कॉरिडोर वही होगा जो संकट के समय मजबूत रहे और सामान्य समय में पर्यावरण तथा स्थानीय समुदाय के लिए टिकाऊ विकास का आधार बने।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर का महत्व आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है। भारत का पूर्वोत्तर अब केवल सीमा क्षेत्र नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ने वाला रणनीतिक क्षेत्र बन रहा है। म्यांमार के जरिए दक्षिण-पूर्व एशिया तक संपर्क, बांग्लादेश के साथ परिवहन सहयोग और पूर्वोत्तर में नए आर्थिक केंद्रों का विकास, इन सभी योजनाओं की सफलता के लिए मजबूत कनेक्टिविटी आवश्यक है। इस संदर्भ में सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए एक कनेक्टिविटी हब की भूमिका निभाता है।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर भौगोलिक रूप से भले ही संकरा हो, लेकिन भारत के लिए इसका महत्व अत्यंत व्यापक है। यह मुख्य भारत और पूर्वोत्तर के बीच संपर्क की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके जरिए सड़क और रेल परिवहन चलता है, नागरिक आवश्यकताओं की आपूर्ति होती है और रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच सुनिश्चित होती है। लेकिन इसकी सुरक्षा का अर्थ केवल सैन्य सुरक्षा नहीं है। मजबूत सड़कें, आधुनिक रेल नेटवर्क, वैकल्पिक मार्ग, सुरक्षित पुल, बेहतर संचार, ऊर्जा आपूर्ति, आपदा प्रबंधन और सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास, ये सभी मिलकर इस क्षेत्र को सुरक्षित और सक्षम बनाते हैं।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति यह होगी कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत करने के साथ-साथ उस पर अत्यधिक निर्भरता भी कम की जाए। जितने अधिक वैकल्पिक मार्ग होंगे, देश की आपूर्ति व्यवस्था उतनी ही अधिक लचीली होगी। एक मजबूत और बहुविकल्पीय संपर्क व्यवस्था न केवल किसी संभावित संकट में देश की रणनीतिक क्षमता बढ़ाएगी, बल्कि पूर्वोत्तर को आर्थिक विकास की मुख्यधारा से और मजबूती से जोड़ने में भी मदद करेगी। इसलिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर को केवल ‘चिकन नेक’ कहना उसके महत्व को छोटा करके देखना होगा। वास्तविकता यह है कि यह भारत की पूर्वोत्तर जीवनरेखा, राष्ट्रीय संपर्क का महत्वपूर्ण सेतु और पूर्वी भारत की रणनीतिक धुरी है। इसका मजबूत होना केवल सीमाओं की सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की भौगोलिक एकता, आर्थिक निरंतरता और भविष्य की कनेक्टिविटी रणनीति का भी महत्वपूर्ण आधार है।
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