नई दिल्ली : विश्व हिंदी परिषद के तत्वावधान में 30-31 अक्टूबर 2026 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन-2026 का भव्य आयोजन किया गया। “भारत रत्न अटल: हिंदी, राष्ट्रवाद और सुशासन” विषय पर आयोजित इस सम्मेलन की अध्यक्षता पद्मभूषण आचार्य यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद, अध्यक्ष, विश्व हिंदी परिषद ने की। सम्मेलन के आयोजन एवं नेतृत्व में डॉ. बिपिन कुमार, राष्ट्रीय महासचिव, विश्व हिंदी परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू, विदेश एवं वस्त्र मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री श्री पबित्रा मार्गेरिटा, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सदस्य-सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री अनिल ठाकुर और संस्कृति मंत्रालय से जुड़े श्री दीपक ठाकुर सहित अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंग्रेज भारत में आकर अंग्रेजी को प्रोत्साहित करते रहे हैं, जबकि डिजिटल क्रांति समाज को बदल रही है। इसलिए सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए अपनी मातृभाषा को महत्व देना जरूरी है और मातृभाषा में पढ़ाई बहुत जरूरी है। सम्मेलन के दौरान हिंदी की वर्तमान स्थिति, वैश्विक स्तर पर उसकी स्वीकार्यता, भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय, राजभाषा हिंदी के प्रभावी कार्यान्वयन तथा नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी को ज्ञान-विज्ञान, उच्च शिक्षा, तकनीकी नवाचार, डिजिटल माध्यमों और आधुनिक संचार प्रणालियों से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि देश-विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय व्यक्तियों और संस्थाओं को एक साझा मंच प्रदान करना रही। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कतर, ब्रिटेन, मॉरीशस, बहरीन, इंडोनेशिया, थाईलैंड, नीदरलैंड और श्रीलंका सहित विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
इस अवसर पर फिजी के राजदूत जगन्नाथ सिमी ने कहा कि हिंदी सिर्फ भाषा नहीं देश की संस्कृति है, भाषा संस्कृति को संरक्षित करती है। आजादी की लड़ाई के समय हिंदी ने सभी को जोड़ा था। भाषा को हथियार के रूप में भी इस्तेमाल किया गया।
फिजी के निवासियों की आधी आबादी सिनेमा के माध्यम से हिंदी बोलती और समझती है, एक समाज को जिंदा रखने के लिए उसकी धर्म-संस्कृति को जिंदा रखना बहुत जरूरी है।
वहीं इंडोनेशिया से आए इन्दु नांदल ने कहा कि यदि भाषा देश की आत्मा है तो प्रकृति परमात्मा है। प्रवासी भारतीयों ने कहा कि हिंदी हमारे लिए केवल भाषा नहीं बल्कि भावना है।
सम्मेलन में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चर्चा करते हुए उनके हिंदी प्रेम, लोकतांत्रिक मूल्यों और सुशासन के प्रति समर्पण को स्मरण किया गया।
पुस्तक विमोचन के विशेष सत्र में जम्मू-कश्मीर के चुनाव आयुक्त श्री शांतमनु, श्री विवेकानंद शांडिल्य, डॉ नंदकिशोर साह तथा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के पौत्र श्री अरविंद कुमार सिंह की पुस्तकों के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यकारों के पुस्तकों का विमोचन किया गया।
सम्मेलन के समापन सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रवि अय्यर ने की। समापन सत्र में भारत सरकार के पूर्व गृह राज्य मंत्री श्री अजय मिश्र टेनी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भाषा संस्कृति का सबसे मजबूत खंभा है 150 से अधिक देशों में ऐसे लोग रहते हैं जो हिंदी बोलते-पढ़ते या समझते हैं, पूरी दुनिया आज भारत की संस्कृति की कहानी जानना चाहती है, एक दिन ऐसा आएगा जब पूरा विश्व बोलेगा भारत माता की जय। हिंदी दुनिया में नई आशा की भाषा है और भारतीयों की बौद्धिकता दुनिया में सबसे अधिक है।
वही विद्वानों ने कहा कि बिना पासपोर्ट, बिना वीजा और बिना किसी घोषणा के हिंदी दुनिया में पहुंच चुकी है, सृष्टि का सर्वोच्च रिश्ता भाषा से ही बनता है। समापन सत्र में वरिष्ठ राजनेता एवं पूर्व सांसद श्री के.सी. त्यागी, श्री अनिल ठाकुर, डॉ. रश्मि सलूजा तथा डॉ. संजय पासवान सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने सहभागिता की।
डॉ. बिपिन कुमार, राष्ट्रीय महासचिव, विश्व हिंदी परिषद ने कहा कि यह सम्मेलन हिंदी के प्रचार-प्रसार, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण और राष्ट्र निर्माण में भाषा की भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर है। दो दिवसीय सम्मेलन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि हिंदी का विकास केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि समाज, शिक्षण संस्थानों, साहित्यकारों, तकनीकी विशेषज्ञों, प्रवासी भारतीयों और हिंदी प्रेमियों के सामूहिक सहयोग से संभव है। डॉ नन्दकिशोर साह राष्ट्रीय संपर्क में बताया कि हिंदी भाषा विश्व भाषा बनाने की ओर अग्रसर है।