*भगवान विश्वकर्मा में निहित है निर्माण की अनंत शक्ति*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 18 सितम्बर ::

सृष्टि में सृजन की प्रक्रिया अनादि से अनंत तक अनवरत जारी रहती है। सृजन केवल किसी वस्तु को आकार देने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चेतन प्रक्रिया है, जिसमें नए विचार, नए उपाय, नई कल्पना और नई अवधारणाओं का आविर्भाव होता है। सृजन में मौलिकता होती है, सम्यकता होती है और भविष्य को बेहतर बनाने की आकांक्षा भी होती है। मनुष्य ने जब पहली बार प्रकृति को समझने का प्रयास किया, तभी से सृजन की यात्रा प्रारंभ हो गई। पत्थर को औजार का रूप देना, लकड़ी से घर बनाना, धातु को उपयोगी वस्तुओं में ढालना, पहिए का निर्माण करना और धीरे-धीरे आधुनिक मशीनों तथा तकनीक तक पहुंचना, यह सब मानव सृजनशीलता की ही कहानी है। इसीलिए सृजन केवल कलाकार की कूची, शिल्पी की छेनी या इंजीनियर की मशीन तक सीमित नहीं है। जहां भी कल्पना को आकार मिलता है, जहां विचार कर्म में बदलता है और जहां श्रम किसी उपयोगी परिणाम को जन्म देता है, वहां सृजन उपस्थित होता है।

भगवान विश्वकर्मा की आराधना का दिन इसी सृजन-चेतना को नमन करने का अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि निर्माण करने वाला हाथ समाज की वास्तविक शक्ति है। खेत में औजार चलाने वाला किसान हो, मशीन चलाने वाला श्रमिक, भवन बनाने वाला राजमिस्त्री, धातु को आकार देने वाला कारीगर, वाहन और उपकरण बनाने वाला तकनीशियन अथवा नई तकनीक विकसित करने वाला इंजीनियर, हर हाथ किसी न किसी रूप में विश्वकर्मा की सृजन परंपरा को आगे बढ़ाता है। विश्वकर्मा पूजा इसलिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि श्रम, कौशल, तकनीक और निर्माण के प्रति सम्मान की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है। आज के दिन सृजन, पुनर्सृजन, सृजनशीलता, सृजनहार, सृजनात्मकता और निर्माण जैसी अवधारणाएं एक-दूसरे से जुड़कर एक व्यापक भावभूमि तैयार करती हैं। यह भावभूमि हमें बताती है कि संसार केवल विचारों से नहीं चलता है। विचार जब श्रम से जुड़ता है, तभी वह वास्तविकता का रूप ग्रहण करता है।

भारतीय परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को शिल्प, वास्तु, निर्माण और तकनीकी कौशल से जोड़ा जाता है। उन्हें देवताओं के दिव्य शिल्पकार और निर्माण-कला का प्रतीक माना जाता है। शिल्पशास्त्रों की परंपरा में विश्वकर्मा का विशेष स्थान है। लोकमान्यता और धार्मिक परंपराओं में उन्हें ऐसे दिव्य सृजनहार के रूप में स्मरण किया जाता है, जिनके माध्यम से निर्माण और कौशल की अवधारणा को आध्यात्मिक आधार मिलता है। भगवान विश्वकर्मा का विराट स्वरूप इस बात का प्रतीक माना जा सकता है कि निर्माण की कोई एक सीमा नहीं होती है। मनुष्य जितना सीखता है, उतना ही उसके सामने सृजन के नए द्वार खुलते जाते हैं। उनका स्मरण हमें यह संदेश देता है कि संसार में कोई भी निर्माण अचानक नहीं होता है। उसके पीछे कल्पना, योजना, ज्ञान, कौशल, श्रम और धैर्य का समन्वय होता है।

भारतीय परंपरा में विश्वकर्मा के पंचमुखी स्वरूप का उल्लेख मिलता है। विभिन्न परंपराओं में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। अयस, काष्ठ, ताम्र, शिला और हिरण्य जैसे पदार्थों से जुड़ा यह प्रतीकात्मक स्वरूप निर्माण की विविधता और शिल्प की व्यापकता का बोध कराता है। धातु हो या लकड़ी, पत्थर हो या अन्य निर्माण सामग्री, मनुष्य ने प्रकृति से प्राप्त संसाधनों को अपनी बुद्धि और कौशल के माध्यम से उपयोगी रूप दिया। यही मानव सभ्यता के विकास की आधारभूत प्रक्रिया रही है। इस दृष्टि से विश्वकर्मा केवल किसी एक कला के देवता नहीं है, बल्कि मानव की उस रचनात्मक शक्ति के प्रतीक हैं, जिसने प्रकृति के साथ संवाद करते हुए जीवन को सुविधाजनक और सुंदर बनाने का प्रयास किया है।

किसी भी निर्माण की शुरुआत वस्तु से नहीं, विचार से होती है। एक भवन बनने से पहले उसका नक्शा बनता है। मशीन बनने से पहले उसका डिजाइन तैयार होता है। कोई पुल अस्तित्व में आने से पहले इंजीनियर के मस्तिष्क में एक कल्पना के रूप में जन्म लेता है। कोई मूर्ति पत्थर में दिखाई देने से पहले कलाकार की दृष्टि में आकार ग्रहण करती है। इसलिए सृजन की पहली प्रयोगशाला मनुष्य का मस्तिष्क है। विचार जब कल्पना से जुड़ता है, कल्पना जब योजना बनती है और योजना जब श्रम एवं कौशल के माध्यम से धरातल पर उतरती है, तब सृजन पूर्णता की ओर बढ़ता है। भगवान विश्वकर्मा की आराधना इसी यात्रा का सम्मान है।

हम अक्सर किसी तैयार वस्तु को देखकर उसके पीछे लगे श्रम को भूल जाते हैं। सुंदर भवन दिखाई देता है, लेकिन उसके निर्माण में लगे मजदूरों का परिश्रम नजर नहीं आता है। चमकदार मशीन दिखाई देती है, लेकिन उसे बनाने वाले इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिकों की साधना पर हमारा ध्यान कम जाता है। विश्वकर्मा पूजा हमें इसी भूल को सुधारने का अवसर देती है। श्रम केवल आजीविका का साधन नहीं है। श्रम मनुष्य की सृजनशील शक्ति की अभिव्यक्ति है। जिस हाथ में औजार है, वह हाथ निर्माण कर रहा है। जिस मस्तिष्क में नई तकनीक का विचार है, वह भी निर्माण कर रहा है। इसलिए श्रमिक और वैज्ञानिक, कारीगर और इंजीनियर, कलाकार और वास्तुकार, सभी सृजन की एक ही विराट परंपरा के अलग-अलग अंग हैं।

सृजन के साथ पुनर्सृजन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समय बदलता है, आवश्यकताएं बदलती हैं और तकनीक बदलती है। जो व्यवस्था कभी उपयोगी थी, वह भविष्य में अपर्याप्त हो सकती है। इसलिए समाज को लगातार स्वयं को पुनर्सृजित करना पड़ता है। पुरानी मशीन का आधुनिक रूप लेना, पारंपरिक शिल्प का नए बाजार से जुड़ना, पुराने भवन का संरक्षण करते हुए उसे नई आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना, पुनर्सृजन के उदाहरण हैं। भारतीय सभ्यता की विशेषता भी यही रही है कि उसने परंपरा को स्थिर वस्तु न मानकर समय के साथ उसका पुनर्पाठ किया है। विश्वकर्मा का संदेश भी इसी भाव में देखा जा सकता है कि निर्माण रुके नहीं, कौशल जड़ न बने और ज्ञान निरंतर आगे बढ़ता रहे।

आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान, स्वचालन, डिजिटल तकनीक और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग के युग में प्रवेश कर चुके हैं। कारखानों में मशीनें पहले से अधिक सक्षम हो रही हैं। निर्माण क्षेत्र में नई तकनीकें आ रही हैं। ऊर्जा, परिवहन और संचार के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं। लेकिन तकनीक चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, उसकी शुरुआत मानवीय कल्पना से ही होती है। मशीन स्वयं अपने उद्देश्य का निर्धारण नहीं करती। उसके पीछे मनुष्य का विचार, ज्ञान और कौशल होता है। इसलिए आधुनिक तकनीकी युग में भगवान विश्वकर्मा की अवधारणा और भी व्यापक प्रतीत होती है। यह हमें याद दिलाती है कि तकनीक का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि मानव जीवन को अधिक सुरक्षित, सुगम और सार्थक बनाना भी होना चाहिए।

सृजन की सुंदरता इसी में है कि इसमें विज्ञान और कला दोनों का समावेश होता है। एक वास्तुकार को गणित भी चाहिए और सौंदर्यबोध भी। एक इंजीनियर को विज्ञान का ज्ञान चाहिए और कल्पनाशक्ति भी। एक कारीगर को तकनीकी दक्षता चाहिए और हाथों की संवेदनशीलता भी। यही कारण है कि शिल्प केवल तकनीक नहीं है और कला केवल सौंदर्य नहीं। दोनों के बीच एक गहरा संबंध है। भगवान विश्वकर्मा की परंपरा इसी समन्वय का प्रतीक बनती है, जहां ज्ञान, कौशल, सौंदर्य और उपयोगिता एक साथ मिलकर निर्माण को पूर्णता प्रदान करते हैं।

विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर मशीनों, औजारों और उपकरणों की पूजा करने की परंपरा है। पहली दृष्टि में यह केवल धार्मिक कर्मकांड लग सकता है, लेकिन इसके भीतर श्रम-सम्मान का गहरा संदेश भी देखा जा सकता है। औजार स्वयं कुछ नहीं करते। उन्हें चलाने वाला हाथ और दिशा देने वाला मस्तिष्क ही उन्हें उपयोगी बनाता है। औजार की पूजा वास्तव में उस श्रम की पूजा है, जिसके माध्यम से समाज आगे बढ़ता है। यह भावना हमें अपने कार्यस्थल, अपने उपकरण और अपने व्यवसाय के प्रति जिम्मेदारी का बोध भी कराती है। जिस साधन से हमारी आजीविका जुड़ी है, उसकी देखभाल करना और उसका सम्मान करना भी कार्य-संस्कृति का हिस्सा है।

विश्वकर्मा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि निर्माण केवल बाहरी दुनिया में नहीं होना चाहिए। मनुष्य को अपने भीतर भी लगातार सृजन करना चाहिए। विचारों में सकारात्मकता का सृजन हो। व्यवहार में विनम्रता का सृजन हो। परिवार में विश्वास का सृजन हो। समाज में सहयोग का सृजन हो। राष्ट्र में विकास और आत्मनिर्भरता का सृजन हो। यदि बाहर विशाल भवन खड़े हो जाएं, लेकिन भीतर संवेदना समाप्त हो जाए, तो वह विकास अधूरा है। सच्चा सृजन वही है जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए।

भगवान विश्वकर्मा का स्मरण हमें अपने भीतर छिपी सृजनशील शक्ति को पहचानने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर कुछ नया करने की क्षमता होती है। कोई अपने हाथों से रचना करता है, कोई बुद्धि से, कोई कला से और कोई सेवा से। इसलिए विश्वकर्मा पूजा किसी एक वर्ग या पेशे तक सीमित भाव नहीं है। यह उस विराट मानवीय चेतना का उत्सव है, जिसने शून्य से संसार को आकार देने का प्रयास किया है। सृष्टि का चक्र चलता रहेगा। पुराना बनेगा, नया जन्म लेगा, नया भी कभी पुराना होगा और फिर उसके भीतर से पुनर्सृजन की संभावना निकलेगी। यही अनादि से अनंत तक चलने वाली सृजन की यात्रा है। आज आवश्यकता है कि हम इस यात्रा में अपनी भूमिका पहचानें। हम केवल उपभोक्ता न बनें, सृजनकर्ता भी बनें। केवल शिकायत न करें, समाधान खोजें। केवल परंपरा पर गर्व न करें, उसे आगे बढ़ाने का प्रयास भी करें। केवल तकनीक का उपयोग न करें, नई तकनीक विकसित करने की क्षमता भी पैदा करें। भगवान विश्वकर्मा के प्रति श्रद्धा का सबसे सुंदर रूप यही हो सकता है कि हम अपने कर्म, कौशल और सृजनशीलता को ईमानदारी से समाज के हित में लगाएं। क्योंकि सृजन में ही विकास है। सृजन में ही संभावना है। सृजन में ही भविष्य है और जहां निर्माण के प्रति श्रद्धा, श्रम के प्रति सम्मान तथा ज्ञान के प्रति समर्पण है, वहीं विश्वकर्मा की सृजन-चेतना जीवंत रहती है।
—————