*पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 – आंकड़ों की मृगतृष्णा या बदलाव की खामोश आहट?* 

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 27 अप्रैल ::

पश्चिम बंगाल की राजनीति को अक्सर एक प्रयोगशाला कहा जाता है, लेकिन हाल के चुनावी परिदृश्य ने इसे एक “विश्वविद्यालय” का रूप दे दिया है, जहाँ हर चुनाव, हर प्रतिशत और हर आंकड़ा एक नया शोध-विषय बन जाता है। यहाँ केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं लिखी जाती है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवहार, मतदाता मनोविज्ञान और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जटिल समीकरण भी आकार लेते हैं। 2026 के चुनावों के संदर्भ में जो सबसे दिलचस्प और बहस योग्य विषय उभरकर सामने आया है, वह है “आंकड़ों की मृगतृष्णा”। एक ऐसा परिदृश्य जिसमें प्रतिशत का खेल वास्तविकता से अलग एक भ्रम पैदा करता दिख रहा है।

चुनावी विश्लेषण में प्रतिशत एक महत्वपूर्ण उपकरण है। लेकिन जब यही प्रतिशत आधार (denominator) में बदलाव के कारण अचानक उछाल लेने लगे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तविक राजनीतिक भागीदारी का संकेत है या केवल गणितीय पुनर्संरचना का परिणाम।

कोलकाता के चौरंगी विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण इस बहस को समझने के लिए बेहद उपयुक्त है। लोकसभा चुनाव के दौरान यहाँ कुल मतदाता संख्या 2,09,713 थी, जिसमें 55.40% मतदान हुआ था। यह एक सामान्य शहरी मतदान पैटर्न माना जा सकता है। लेकिन 2026 में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) के बाद यदि 83,364 मतदाता सूची से हट जाते हैं और कुल मतदाता संख्या घटकर 1,26,349 रह जाती है, तो वही वास्तविक मतों की संख्या अब लगभग 90% या उससे अधिक मतदान प्रतिशत के रूप में दिखाई देगी।

यहाँ मूल प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में लोगों की भागीदारी बढ़ी है, या केवल मतदाता सूची के संकुचन ने प्रतिशत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर दिया है? इस पूरे विमर्श में एक नया शब्द उभरकर सामने आया है “अदृश्य वोटर”। ये वे मतदाता हैं जो पहले सूची में थे, लेकिन अब नहीं हैं। उनके हटने के पीछे कई कारण हो सकते हैं मृत्यु, स्थानांतरण, डुप्लीकेट एंट्री या प्रशासनिक त्रुटियाँ। लेकिन राजनीति में हर संख्या का एक अर्थ होता है। जब बड़ी संख्या में नाम सूची से हटते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाती है, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है। प्रश्न उठता है कि ये वोट किसके थे? क्या उनका हटना किसी विशेष दल को लाभ या हानि पहुँचा सकता है?

दूसरे चरण के कई क्षेत्रों में 90% से अधिक मतदान की संभावना जताई जा रही है। पहली नजर में यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत लगता है अधिक भागीदारी, अधिक जागरूकता। लेकिन जब इसके पीछे के गणित को देखा जाता है, तो तस्वीर थोड़ी जटिल हो जाती है। यदि मतदाता संख्या में भारी कमी आती है और वास्तविक वोटों की संख्या लगभग स्थिर रहती है, तो प्रतिशत स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। इसे “सांख्यिकीय उछाल” कहा जा सकता है। लेकिन राजनीति में हर उछाल के पीछे एक कथा होती है और यही कथा इस बार चर्चा का केंद्र बनी हुई है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि एक गहरी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण यदि निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होता है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करता है। लेकिन यदि इसमें पक्षपात या अनियमितता की आशंका हो, तो यह विश्वास के संकट को जन्म देता है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि उच्च मतदान प्रतिशत को अक्सर सत्ता के खिलाफ जनाक्रोश या बदलाव की इच्छा के रूप में भी देखा जाता है। लेकिन यदि यह प्रतिशत वास्तविक भागीदारी के बजाय सूची के संकुचन का परिणाम हो, तो इसके राजनीतिक अर्थ पूरी तरह बदल सकते हैं।

चुनाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि धारणा (perception) की भी लड़ाई है। 90% मतदान का आंकड़ा अपने आप में एक संदेश देता है चाहे वह वास्तविक हो या सांख्यिकीय। यह मतदाताओं, कार्यकर्ताओं और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के बीच भी एक धारणा बनाता है कि यहाँ असाधारण राजनीतिक सक्रियता है। राजनीतिक दल इस धारणा का उपयोग अपने-अपने नैरेटिव को मजबूत करने के लिए कर सकते हैं। कोई इसे “जनसमर्थन की लहर” बताएगा, तो कोई “प्रशासनिक हेरफेर” का आरोप लगाएगा।

मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित और आवश्यक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य सूची को अद्यतन और सटीक बनाना होता है। लेकिन जब यह प्रक्रिया चुनाव के ठीक पहले बड़े पैमाने पर होती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। क्या सभी नाम निष्पक्षता से हटाए गए? क्या सभी पात्र मतदाताओं को शामिल किया गया? क्या इस प्रक्रिया में पारदर्शिता थी? ये सवाल केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के मन में भी उठते हैं।

आखिरकार, इन सभी सवालों का उत्तर चुनाव परिणामों में ही छिपा होता है। 4 मई को जब नतीजे सामने आएंगे, तब यह स्पष्ट होगा कि यह “आंकड़ों की मृगतृष्णा” थी या वास्तव में कोई “खामोश लहर” चल रही थी। यदि परिणाम अपेक्षित पैटर्न से अलग आते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि आंकड़ों के पीछे कोई गहरी राजनीतिक सच्चाई छिपी थी। लेकिन यदि परिणाम सामान्य प्रवृत्तियों के अनुरूप रहते हैं, तो यह साबित हो सकता है कि यह केवल गणितीय भ्रम था।

पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं है, बल्कि आंकड़ों और वास्तविकता के बीच भी एक संघर्ष है। चुनाव यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या केवल प्रतिशत के आधार पर निष्कर्ष निकाल सकते हैं, या उसके पीछे के संदर्भ को भी समझना होगा। थोड़ा सा राजनीतिक ज्ञान और तार्किक दृष्टिकोण इस “तिलिस्म” को समझने के लिए पर्याप्त है। आंकड़े अपने आप में कभी झूठ नहीं बोलते, लेकिन उनका प्रस्तुतीकरण और संदर्भ उन्हें भ्रमित कर सकता है। तब तक, जब तक अंतिम परिणाम सामने नहीं आते, यह बहस जारी रहेगी कि क्या यह केवल एक कागजी खेल है या बदलाव की कोई गहरी, खामोश आहट?

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