जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 16 फरवरी ::
मानव जीवन में विचारों की भूमिका अत्यंत निर्णायक होती है। सकारात्मक विचार जहाँ समस्त इंद्रियों को एकाग्र कर व्यक्ति को विकास, सृजन और उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं, वहीं नकारात्मकता मन, मर्यादा, धन, बल और यश को क्षीण करती हुई लक्ष्य से भटका देती है। यही सिद्धांत व्यक्तिगत जीवन से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक समान रूप से लागू होता है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राजनीतिक नेतृत्व केवल सत्ता का प्रश्न नहीं, बल्कि दृष्टि, धैर्य और राष्ट्रहित की प्राथमिकता का प्रश्न होता है। जब राजनीतिक विमर्श विकास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिष्ठा पर केंद्रित होता है, तब देश आगे बढ़ता है। परंतु जब राजनीति का केंद्र बिंदु केवल विरोध, अविश्वास और व्यक्तिगत आक्षेप बन जाता है, तब उसका प्रभाव व्यापक राष्ट्रीय मनोविज्ञान पर पड़ता है।
पिछले एक दशक से अधिक समय में भारतीय राजनीति में जो वैचारिक टकराव दिखाई देता है, वह केवल दो नेताओं या दो दलों के बीच संघर्ष नहीं है, बल्कि सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच एक गहन मनोवैज्ञानिक और वैचारिक संघर्ष है।
सकारात्मकता का अर्थ यह नहीं कि समस्याओं को नकार दिया जाए। इसका अर्थ है समस्याओं को स्वीकार कर समाधान की दिशा में बढ़ना। आलोचना को सुधार के अवसर में बदलना और व्यक्तिगत आक्षेपों से ऊपर उठकर संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना। जब कोई नेतृत्व सकारात्मक दृष्टि रखता है, तो वह आलोचना के बावजूद कार्य करता है। वह स्वयं को सिद्ध करने के लिए काम करता है, न कि दूसरों को गिराने के लिए।
नकारात्मक राजनीति के कुछ लक्षण स्पष्ट होते हैं। निरंतर अविश्वास का वातावरण बनाना। राष्ट्र की उपलब्धियों को संदेह की दृष्टि से देखना। हर नीति में विफलता ढूँढना और विरोध को ही अस्तित्व का आधार बना लेना। ऐसी राजनीति अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह राजनीतिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा संसदीय लोकतंत्र है। यहाँ सरकार को संसद के प्रति उत्तरदायी माना गया है। यदि बहुमत का विश्वास समाप्त हो जाए, तो सरकार गिर सकती है। इसी संदर्भ में “अविश्वास प्रस्ताव” एक संवैधानिक औजार है।
भारतीय संसदीय इतिहास में अब तक अनेक बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं। संविधान और संसदीय नियमों के तहत यह विपक्ष का अधिकार है। पूर्व में लगभग 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और दो अवसरों पर सरकार को पद छोड़ना पड़ा। एक अवसर पर मोरारजी देसाई ने बहुमत परीक्षण से पहले ही इस्तीफा देना उचित समझा। दूसरे अवसर पर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट से पराजित हुई। इन घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र की गंभीरता और संवैधानिक मजबूती को सिद्ध किया।
लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के विरुद्ध भी प्रस्ताव लाने की परंपरा रही है। इतिहास में ऐसे प्रयोग कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने विभिन्न परिस्थितियों में किया है। चटर्जी और महाजन के संदर्भ में भी ऐसी राजनीतिक परिस्थितियाँ बनीं थी। परिणाम अधिकांशतः यह रहा कि यदि सरकार के पास बहुमत है, तो प्रस्ताव प्रतीकात्मक रह जाता है। यह संसदीय रणनीति का हिस्सा होता है, लेकिन अंतिम निर्णय संख्याबल तय करता है।
अविश्वास प्रस्ताव केवल सरकार गिराने का प्रयास नहीं होता है। यह एक राजनीतिक संदेश भी होता है। विपक्ष के लिए यह अवसर होता है अपनी बात देश के सामने रखने का। सरकार को कटघरे में खड़ा करने का और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करने का। लेकिन यदि यह पहल केवल व्यक्तिगत विरोध या प्रतिद्वंद्वी को कमजोर साबित करने तक सीमित रह जाए, तो उसकी प्रभावशीलता घट जाती है।
आलोचकों का मानना है कि पिछले वर्षों में राहुल गांधी की राजनीति का एक केंद्रीय बिंदु नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती देना रहा है। यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या यह चुनौती केवल आलोचना तक सीमित रही या इसके साथ कोई ठोस वैकल्पिक नीति-दृष्टि भी प्रस्तुत की गई? यदि राजनीति का केंद्र “किसी को कमजोर साबित करना” बन जाए, तो वह राष्ट्रहित की व्यापक चर्चा से दूर हो जाती है। लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन रचनात्मक विरोध अधिक प्रभावी होता है।
पिछले वर्षों में भारत ने अवसंरचना, डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष, रक्षा, विदेश नीति और सामाजिक कल्याण योजनाओं में व्यापक विस्तार देखा है। सरकार का दावा है कि यह “विकास केंद्रित राजनीति” का परिणाम है।
सकारात्मक नेतृत्व के कुछ संकेत हैं दीर्घकालिक नीतियाँ। वैश्विक मंचों पर सक्रियता। आत्मनिर्भरता की दिशा में पहल और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा। वहीं एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व है सरकार को जवाबदेह रखना। वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करना और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करना। यदि विपक्ष केवल आलोचना करे और ठोस विकल्प न दे, तो वह जनता के विश्वास को स्थायी रूप से अर्जित नहीं कर पाता है।
राजनीति में नीयत (intention) और नीति (policy) दोनों का महत्व है। कई बार राजनीतिक असफलता का कारण रणनीति नहीं, बल्कि धारणा होती है। “कृपलानी से शुरू सफर बिड़ला तक” की बात करें तो संसदीय इतिहास में अनेक अध्यक्ष आए और गए। लेकिन हर बार विवाद का मूल कारण नीयत और राजनीतिक वातावरण रहा है। यदि किसी प्रस्ताव का उद्देश्य संस्थागत सुधार न होकर राजनीतिक संदेश मात्र हो, तो उसका परिणाम पूर्वानुमेय होता है।
लोकतंत्र में बहुमत अंतिम निर्णय देता है। लेकिन बहुमत का अर्थ निरंकुशता नहीं है। बहुमत के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा होता है, जिसमें विपक्ष का सम्मान। संसदीय शिष्टाचार और संवाद की परंपरा शामिल है। अल्पमत भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। क्योंकि वह चेतावनी देता है। वह वैकल्पिक दृष्टि देता है और वह भविष्य की संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन यदि अल्पमत निरंतर अविश्वास और आरोपों की राजनीति में उलझ जाए, तो उसकी प्रभावशीलता कम हो जाती है।
आज भारत वैश्विक मंच पर एक उभरती शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता। अंतरिक्ष मिशन। डिजिटल भुगतान प्रणाली और रक्षा निर्यात। ऐसे समय में यदि घरेलू राजनीति में निरंतर अस्थिरता का संदेश जाए, तो उसका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी पड़ता है। इसलिए राजनीतिक आलोचना और राष्ट्रीय छवि के बीच संतुलन आवश्यक है।
अविश्वास प्रस्ताव केवल संसद तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि यह मीडिया में चर्चा बनता है। जनता के मन में प्रश्न उठाता है। निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करता है। यदि प्रस्ताव का आधार ठोस तथ्यों पर हो, तो वह गंभीर बहस का विषय बनता है। लेकिन यदि वह प्रतीकात्मक हो, तो उसे राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जाता है।
राजनीति में निरंतर नकारात्मकता अंततः स्वयं पर भी प्रभाव डालती है। विश्वसनीयता कम होती है। समर्थकों में भ्रम उत्पन्न होता है और वैचारिक स्पष्टता धुंधली पड़ती है। यदि किसी नेता की छवि “सदैव विरोध” तक सीमित रह जाए, तो जनता उसे वैकल्पिक शासन क्षमता के रूप में नहीं देख पाती है।
एक सशक्त नेता की पहचान क्या है? संकट में धैर्य। आलोचना में संयम। निर्णय में स्पष्टता और लक्ष्य में स्थिरता। नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक परिणामों से सिद्ध होता है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और बहस की परंपरा है। संसद केवल संख्या का मंच नहीं है, बल्कि विचारों का संगम है। यदि राजनीतिक दल सकारात्मकता बनाए रखें तो बहस का स्तर ऊँचा होगा। जनता का विश्वास बढ़ेगा और नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित होगी।
विचारों में सकारात्मकता बनाए रखना केवल व्यक्तिगत सलाह नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है। नकारात्मकता क्षय करती है और सकारात्मकता निर्माण करती है। अविश्वास प्रस्ताव लोकतंत्र का वैध औजार है। लेकिन उसका उद्देश्य यदि केवल विरोध हो, तो वह क्षणिक प्रभाव डालता है। यदि उसका उद्देश्य सुधार और वैकल्पिक दृष्टि हो, तो वह इतिहास में दर्ज होता है।
राजनीति में वही टिकता है जिसकी नीयत स्पष्ट और दृष्टि व्यापक होता है। व्यक्तिगत संघर्ष से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना ही सच्ची सकारात्मक राजनीति है। भारत का लोकतंत्र परिपक्व है। यह समय की कसौटी पर हर नेतृत्व को परखेगा, चाहे वह सत्तापक्ष में हो या विपक्ष में। सकारात्मकता, संवाद और संवैधानिक मर्यादा, यही लोकतंत्र की स्थायी धुरी हैं।
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